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हिन्दी हमारी संस्कृति, इसके बिना विकसित भारत के निर्माण की परिकल्पना बेमानी

by Bhupendra Sahu

रायपुर हिन्दी मात्र एक भाषा नहीं बल्कि यह हमारी संस्कृति है, संस्कार है, चेतना है और भारत की आत्मा है। हिन्दी के उपयोग के बिना विकसित भारत की परिकल्पना नहीं की जा सकती। विकसित भारत की निर्माण में हिन्दी की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राजभाषा के साथ-साथ संपर्क तथा समन्वय की भाषा भी है और भारत के विभिन्न राज्यों को एक सूत्र में पिरोती है। यह विचार इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में आज यहां हिन्दी पखवाड़ा 2025 के समापन के अवसर पर ‘‘विकसित भारत के निर्माण में हिन्दी की भूमिका’’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी में विद्वान वक्ताओं द्वारा व्यक्त किये गये। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल थे। विद्वान वक्ताओं के रूप में श्री शशांक शर्मा, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी, डॉ. चितरंजन कर सेवानिवृत्त प्राध्यापक, भाषा विज्ञान, तथा श्री गिरीश पंकज, वरिष्ठ साहित्यकार थे। विशिष्ट अतिथि के रूप में कृषि महाविद्यालय रायपुर की अधिष्ठाता डॉ. आरती गुहे उपस्थित थी। कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता छात्र कल्याण डॉ. संजय शर्मा ने की। इस अवसर पर विभिन्न साहित्यिक प्रतियोगिताओं विजेता रहे प्रतिभागियों को पुरस्कृत भी किया गया।

 

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने कहा कि भारत के विकास में हिन्दी ने अहम योगदान दिया है। हिन्दी में शिक्षा देने से अधिक लोगों को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला है। हिन्दी में शैक्षिक सामग्री और संसाधनों की उपलब्धता से विद्यार्थियों को अपनी मात्र भाषा में सीखने का अवसर मिल सकता है जिससे उन्हे ज्ञान प्राप्ति में आसानी होगी। हिन्दी एक साझा भाषा के रूप में देश के विभिन्न राज्यों के लोगों को जोड़ने में मदद कर सकती है जिससे आपसी संचार और एकता में आसानी होगी। भारत की समृद्ध सांस्कृत विरासत को संरक्षित और प्रसारित करने में हिन्दी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसी तरह हिन्दी में व्यवसाय और व्यापार को बढ़ावा देने से स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत किया जा सकता है और रोजगार के अवसर पैदा किये जा सकते है।

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