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छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण द्वारा ग्राम गोढ़ी में हुआ किसान सम्मेलन

by Bhupendra Sahu

रायपुर छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण (सीबीडीए), रायपुर द्वारा राष्ट्रीय शर्करा संस्थान (एनएसआई), कानपुर के सहयोग से विगत 05 मई 2026 को दुर्ग जिले के बायोफ्यूल कॉम्प्लेक्स, ग्राम गोढ़ी में किसान सम्मेलन आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में कवर्धा, बेमेतरा एवं दुर्ग जिले के गन्ना उत्पादक किसान तथा कृषि विभाग के अधिकारीगण उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. सीमा परोहा, निदेशक, एनएसआई कानपुर, डॉ. लोकेश बाबर, सहायक प्राध्यापक, एनएसआई तथा श्री सुमित सरकार, मुख्य कार्यपालन अधिकारी, सीबीडीए की विशेष उपस्थिति रही।

छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण द्वारा ग्राम गोढ़ी में हुआ किसान सम्मेलन

इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य गन्ना आधारित खेती में सफेद चुकंदर (शुगरबीट) को अंतरफसली के रूप में अपनाकर भूमि उपयोग दक्षता बढ़ाना, फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना तथा किसानों की आय में वृद्धि करना था। इस दौरान किसानों को शुगरबीट की खेती का प्रत्यक्ष भ्रमण कराया गया एवं फसल की खुदाई भी की गई, जिसमें शुगरबीट का औसत वजन लगभग 3.7 किलोग्राम पाया गया, जो इसकी सफल खेती की संभावनाओं को दर्शाता है। किसानों ने शुगरबीट के लिए शीघ्र मूल्य निर्धारण एवं प्रभावी विपणन तंत्र विकसित करने की मांग की, साथ ही किसानों द्वारा लाए गए गन्ना फसल के नमूनों पर विशेषज्ञों ने रोग प्रबंधन हेतु आवश्यक तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया।

छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण द्वारा ग्राम गोढ़ी में हुआ किसान सम्मेलन

अपने संबोधन में श्री सुमित सरकार ने बताया कि सीबीडीए राज्य में बायोडीजल, बायोएथेनॉल, कंप्रेस्ड बायोगैस एवं ग्रीन हाइड्रोजन जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के विकास हेतु कार्यरत है। इसी क्रम में, नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट के सहयोग से राज्य में पहली बार गन्ना एवं सफेद चुकंदर (शुगर बीट) की अंतरफसली खेती पर अनुसंधान प्रारंभ किया गया है। उन्होंने कहा कि गन्ना एक दीर्घकालीन फसल होने के कारण इसकी प्रारंभिक अवस्था में भूमि का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता, इसलिए शुगरबीट जैसी अल्पावधि फसल को अंतरफसली रूप में अपनाना किसानों के लिए लाभकारी है। उन्होंने बताया कि शुगरबीट लगभग 5-6 माह में तैयार हो जाती है और इसे गन्ने के साथ उगाकर अतिरिक्त उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है, जिससे बायोएथेनॉल उत्पादन हेतु अतिरिक्त कच्चा माल उपलब्ध होगा तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।

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