भिलाई। प्रवचन के समापन पर देवी जी ने भक्ति तत्त्व पर विचार करते हुए आगे बताया की चार भाव हैं भगवान से प्यार करने के; एक से एक ऊंचे दास्य भाव, सख्य भाव, वात्सल्य भाव, माधुर्य भाव । और देवी जी ने बताया कि माधुर्य ही सर्वश्रेष्ठ भाव है यानि भगवान हमारे प्रियतम हैं जीवात्मा उनकी प्रेयसी है; यही गोपी भाव है ।
इसी भाव से जीव को भगवान से प्यार करना चाहिए क्योंकि इस भाव में नीचे के समस्त भाव आ जाते हैं; भगवान् हमारे प्रियतम भी हैं, बेटे भी हैं, सखा भी हैं, स्वामी भी हैं ।और इस माधुर्य भाव में भी जो जीव भगवान् के सुख के लिए ही उनसे प्यार करता है वही जीव भगवान् के सर्वोच्च प्रेम प्राप्त करने का अधिकारी बनाता है । तो इस प्रकार भक्ति ही एक मात्र सबसे सरल,सुगम मार्ग है जो जल्दी से जल्दी जीव का कल्याण करके भगवान् तक ले जाती है ।