रायपुर। छत्तीसगढ़ में छेरछेरा का अलग ही महत्व है। वर्षों से मनाया जाने वाला ये पारंपरिक लोक पर्व साल के शुरुआत में मनाया जाता है। इस दिन रुपये पैसे नहीं बल्कि अन्न का दान करते हैं। पौष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा यानी आज प्रदेशभर में छेरछेरा मनाया जाएगा। दान को समर्पित इस लोकपर्व की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसमें अमीरी-गरीबी का कोई भेद नहीं है। याचक किसी भी दरवाजे पर दस्तक दे, वहां से खाली हाथ नहीं लौटता। हर व्यक्ति अपनी शक्ति और सामथ्र्य के अनुसार उन्हें कुछ न कुछ देकर ही विदा करता है। दान की इस संस्कृति का हमारे समाजों पर भी गहरा प्रभाव दिखता है। यही वजह है कि छेरछेरा भले एक दिन पड़ता हो लेकिन इसे मनाने की मूल भावना सालभर जिंदा रहती है।
यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस पर्व पर बच्चे गाते हैं कि छेरी के छेरा, छेर बरतनिन छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरहेरा, इसका तात्पर्य है कि हे घर की मालकिन अपना सारा कामकाज छोड़छाड़ दो और अपने कोठार में रखे दान में से कुछ अनाज हमें दान में दो। भगवान तुम्हारे घर के अनाज का कोठार हमेशा भरा रखे, कभी खाली न हो। आवाज सुनकर पूरे सम्मान के साथ बच्चों को दान दिया जाता है।
फसल कटाई से जुड़ा है पर्व
महामाया मंदिर के पुजारी पं.मनोज शुक्ला के अनुसार छेरछेरा पर्व छत्तीसगढ़ में धान फसल की कटाई के बाद मनाया जाता है। किसान कुल फसल का आधा हिस्सा बेच देता है, आधे में से एक हिस्सा मजदूरों के लिए रखता है और एक हिस्सा गरीब, जरूरतमंदों को दान देने के लिए अलग से रखा जाता है। मकर संक्राति के आसपास ही पौष पूर्णिमा तिथि पड़ती है। इस दिन दान करने से राजा बलि के समान यश की प्राप्ति होती है।
इसलिए मनाते हैं छेरछेरा
धान का कटोरा कहलाने वाला भारत का एक मात्र प्रदेश छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान प्रदेश है। यहां पर ज्यादातर किसान वर्ग के लोग रहते हैं। कृषि ही उनके जीवकोपार्जन का मुख्य साधन होता है। यही वजह है कि कृषि आधारित जीवकोपार्जन और जीवन शैली ही अन्न दान करने का पर्व मनाने की प्रेरणा देती है। अपने धन की पवित्रता के लिए छेरछेरा तिहार मनाया जाता है। क्योंकि जनमानस में ये अवधारणा है कि दान करने से धन की शुद्धि होती है।

माई कोठी के धान ला हेर हेरा
छेरछेरा पर बच्चे गली-मोहल्लों, घरों में जाकर छेरछेरा (दान) मांगते हैं। दान लेते समय बच्चे ‘छेर छेरा माई कोठी के धान ला हेर हेराÓ कहते हैं और जब तक आप अन्न दान नहीं देंगे तब तक वे कहते रहेंगे- ‘अरन बरन कोदो करन, जब्भे देबे तब्भे टरनÓ। इसका मतलब ये होता है कि बच्चे आपसे कह रहे हैं, मां दान दो, जब तक दान नहीं दोगे तब तक हम नहीं जाएंगे।