नई दिल्ली । भाजपा की एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजनीतिक प्रस्ताव पेश किया। अब तक राजनीतिक प्रस्ताव पेश करने का काम पार्टी के वरिष्ठ नेता किया करते थे। 2017/18 की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यह प्रस्ताव पेश किया था। लेकिन इस बार बैठक में राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी जैसे वरिष्ठ नेताओं के होने के बावजूद यह भूमिका योगी आदित्यनाथ को सौंपकर पार्टी ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। एक तरफ उसने चुनाव के समय प्रदेश की जनता के बीच मुख्यमंत्री के राजनीतिक कद को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते जाने का संकेत दिया है, तो वहीं ऐसा कर उसने मोदी बनाम योगी के उस विवाद का भी पटाक्षेप करने की कोशिश की है, जो उसके लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता था।
2017 के बाद बढ़ी तनातनी
माना जाता है कि 2017 के विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद से ही दोनों नेताओं में आपसी तनातनी बढ़ गई थी। इसका कारण था कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व अन्य राज्यों की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी अपने अनुसार मुख्यमंत्री का नाम तय करना चाहता था, लेकिन योगी आदित्यनाथ उनकी इस राह में रोड़ा बन गए थे। हाल ही में यह विवाद एक बार फिर तब चर्चा में आ गया जब कथित तौर पर उत्तर प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की भूमिका तैयार की जा रही थी। इस समय पर यूपी भाजपा में पार्टी दो फाड़ होती भी दिख रही थी। लेकिन योगी आदित्यनाथ के कड़े रूख के बाद यह मामला ठंडा पड़ गया। इसी प्रकार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने मंत्रिमंडल विस्तार में एके शर्मा को कोई भूमिका न देने पर अड़ गए थे। पूर्व नौकरशाह एके शर्मा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद करीबी माने जाते हैं। कहा गया कि उन्हें टीम में मौका देकर योगी आदित्यनाथ अपने नजदीक केंद्र के किसी खास आदमी को नहीं देखना चाहते थे।
दोनों के लिए उत्तर प्रदेश महत्वपूर्ण
यूपी की चुनावी जीत योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह जीत उन्हें भाजपा के बड़े नेताओं में स्थापित कर देगी, तो भविष्य में उनकी केंद्रीय टीम में बड़ी भागीदारी के द्वार भी खोलेगी। लेकिन यदि यूपी का चुनावी परिणाम पार्टी की उम्मीदों के विपरीत आता है, तो उनकी लंबी सियासी पारी में एक बड़ा ब्रेक लग सकता है। ठीक इसी तरह यूपी की जीत पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के लिए भी बेहद जरूरी है। उत्तर प्रदेश ही केंद्रीय सत्ता का द्वार माना जाता है। यहां 2022 में अच्छा प्रदर्शन 2024 में भी पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की नींव रखेगा, जबकि कोई भी विपरीत परिणाम विपक्ष को मोदी का जादू खत्म होने के रूप में प्रचारित करने का अवसर देगा। विपक्ष इसे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी के करिश्मे और विपक्ष की वापसी के तौर पर भी प्रचारित करने की कोशिश कर सकता है। उत्तर प्रदेश की सियासी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होने के कारण भाजपा नेतृत्व ऐसा कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं होगा। माना जा रहा है कि इसी सियासी गुणा-भाग के कारण पार्टी ने इस विवाद का पटाक्षेप करने की रणनीति तैयार की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपनी वाराणसी की जनसभा में योगी आदित्यनाथ की जमकर प्रशंसा की, तो अमित शाह ने लखनऊ में कह दिया कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दोबारा सत्ता में लाना है, तो इसके लिए उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को लाना बेहद जरूरी है। इसे योगी आदित्यनाथ के लिए केंद्र की तरफ से बड़े संकेत के रूप में देखा गया। अब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रस्ताव पेश करने की भूमिका देकर भी इसी संकेत को मजबूती से रखने की कोशिश की गई है।
केवल अटकलबाजी
उत्तर प्रदेश की चुनावी टीम में प्रमुख भूमिका निभा रहे पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, मोदी बनाम योगी का यह विवाद केवल मीडिया की अटकलबाजी है। इसके पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के बीच भी इसी तरह के संघर्ष की बातें कही जाती थीं, लेकिन दोनों ही नेताओं ने बेहद गरिमापूर्ण ढंग से अपना राजनीतिक जीवन जिया और दोनों के बीच विवाद जैसी कोई बात कभी सामने नहीं आई।
नेता के मुताबिक, ठीक उसी प्रकार की अटकलबाजी अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच भी कही जा रही है। लेकिन दोनों नेताओं के बीच किसी प्रकार की कोई दूरी नहीं है। दोनों ही नेता पूरी मजबूती से जनता के काम करने में जुटे हुए हैं और आने वाले समय में भारत इन्हीं नेताओं के नेतृत्व में मजबूत राष्ट्र बनकर उभरेगा।