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सुप्रीम कोर्ट तय करेगा शिक्षा ग्राहक सेवा में है या नहीं

by Bhupendra Sahu

नई दिल्ली । क्या शिक्षा भी उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत सेवा की परिभाषा के दायरे में आता है? यह सवाल देश की सर्वोच्च अदालत के सामने उठा है। नैशनल कंज्यूमर फोरम ने अपने फैसले में कहा था कि कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत एजुकेशन, सर्विस नहीं माना गया है। फोरम के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई। सुप्रीम कोर्ट कोर्ट इस बात को तय करेगा कि क्या एजुकेशन सर्विस है या नहीं?

क्या है या मामला
दरअसल, मामला एक छात्र से जुड़ा है जिसने स्कूल की तरफ से आयोजित समर कैंप में भाग लिया था। वह इस दौरान स्कूल के स्विमिंग पूल मे डूब गया और बाद में उसकी मौत हो गई। बच्चे के पिता ने इस मामले में राज्य उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया और कहा कि यह सेवा में कोताही है। उन्होंने स्कूल पर लापरवाही बरतने का आरोप लगाया, लेकिन राज्य उपभोक्ता अदालत ने याचिका पर विचार से इनकार कर दिया। फिर पीडि़त परिवार ने नैशनल कंज्यूमर फोरम का दरवाजा खटखटाया।

नैशनल कंज्यूमर फोरम ने खारिज की याचिका
नैशनल कंज्यूमर फोरम ने अपने फैसले में कहा कि कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत एजुकेशन में अतिरिक्त गतिविधियां भी शामिल हैं, मसलन स्विमिंग आदि जो कंज्यूमर प्रोटेक्टन एक्ट के तहत सर्विस नहीं हैं। नैशनल कंज्यूमर फोरम ने अपने बड़े बेंच के फैसले का हवाला दिया। लार्जर बेंच ने मोनू सोलंकी संबंधित वाद में कहा था कि एजुकेशन संस्थान, कंज्यूमर प्रोटेक्ट एक्ट के दायरे में नहीं आते हैं। एजुकेशन संस्थानों में वोकेशनल कोर्स और अन्य एक्टिविटी होती है। उसने साफ कहा कि स्कूल की तरफ से आयोजित टूर, पिकनिक, एक्स्ट्रा कुरिकुलर गतिविधि, स्विमिंग और स्पोर्ट्स आदि कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के दायरे में नहीं हैं। नैशनल कंज्यूमर फोरम ने 8 फरवरी 2021 को मौजूदा मामले में अर्जी खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई
स्कूली स्टूडेंट के पिता की ओर से नैशनल कंज्यूमर फोरम के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि मोनू सोलंकी संबंधित वाद पहले से सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है जिसमें यह मुद्दा है कि एजुकेशन, कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत सर्विस है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में दाखिल विशेष अनुमति याचिका सुनवाई के लिए मंजूर की जाती है और पहले से पेंडिंग केस के साथ टैग किया जाता है।

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