भिलाई। दुर्गा मंदिर परिसर एचएससीएल कालोनी स्टेशन मरोदा में चल रहे दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन के समापन पे गोपिकेश्वरी देवी जी ने भक्ति के स्वरूप के बारे में बताया कि भक्ति में छ: गुण होते हैं । भक्ति अनंत जन्मों के समस्त पापों को नष्ट कर देती है, समस्त शुभता प्रदान करने वाली है, भगवान को अपने वश में करने वाली है, चारों पदार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष तक के सुख को भी नगण्य कर देती है, निर्गुण निराकार ब्रह्म के अनंतकोटि ब्रह्मानन्द का सौरस्य इस प्रेमानंद में है जो भक्ति प्रदान करती है, भक्ति अत्यंत दुर्लभ है केवल साधन हीन जीव को ही प्राप्त होती है ।
आगे उन्होंने बताया कि भक्ति करने वालों को भगवान से कभी कुछ मांगना नहीं चाहिए निष्काम भक्ति करनी चाहिए और चार भाव हैं भगवान से प्यार करने के एक से एक ऊंचे दास्य भाव, सख्य भाव, वात्सल्य भाव, माधुर्य भाव । गोपिकेश्वरी देवी जी ने बताया कि माधुर्य भाव ही सर्वर्षेठ भाव है यही गोपी भाव है इसलिए इसी भाव से जीव को प्यार करना चाहिए क्योंकि इस भाव नीचे के समस्त भाव आ जाते हैं । यही भाव जीव को भगवान के सर्वोच्च प्रेम प्राप्त करने का अधिकारी बनाता है । इसी प्रकार भक्ति ही जीव का कल्याण करके भगवान तक लेके जा सकती है । आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण उपस्थित थे।