रायपुर “शायद वह अभी कंस्ट्रक्शन साइट पर व्यस्त होंगे,” मोनिखा सोनोवाल ने मुस्कुराते हुए कहा, जब वह अपने पिता को फोन लगाने की कोशिश कर रही थीं। कुछ ही क्षण पहले 19 वर्षीय मोनिखा ने यहां जारी पहले खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में महिलाओं के 48 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग वर्ग में स्वर्ण पदक जीता था और यह खुशखबरी अपने पिता को देना चाहती थीं।
राजमिस्त्री की बेटी मोनिखा सोनोवाल ने दर्द और आत्म-संदेह को हराकर जीता केआईटीजी वेटलिफ्टिंग गोल्ड
उनके पिता पद्मधर सोनोवाल एक राजमिस्त्री हैं, जो चार सदस्यों के परिवार का पालन-पोषण करने के लिए दिनभर कड़ी मेहनत करते हैं। मोनिखा की खेल यात्रा में वे हमेशा उनकी सबसे बड़ी ताकत रहे हैं।
दो बहनों में बड़ी मोनिखा असम के धेमाजी जिले के बटघोरिया पेनबेनी चौक की रहने वाली हैं। ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर बसे इस शांत इलाके की दूरी गुवाहाटी से लगभग 425 किलोमीटर है। यहां जीवन शांत और साधारण है, जहां ज्यादातर परिवारों के सपने रोजमर्रा की जरूरतों तक ही सीमित रहते हैं।
लेकिन मोनिखा के लिए वेटलिफ्टिंग हॉल में बजने वाली बारबेल की आवाज एक ऐसे सपने की शुरुआत थी, जो सीमाओं में बंधने को तैयार नहीं था। सीमित संसाधनों के बावजूद खेल के प्रति उनकी जिज्ञासा धीरे-धीरे जुनून में बदल गई, जिसे पड़ोसी राज्य मणिपुर की टोक्यो ओलंपिक रजत पदक विजेता मीराबाई चानू से प्रेरणा मिली।
और गुरुवार को वही सपना हकीकत में बदल गया, जब उन्होंने घुटने की चोट के बावजूद संघर्ष करते हुए खेलों का पहला वेटलिफ्टिंग स्वर्ण पदक अपने नाम किया। यह जीत उनके वर्षों की मेहनत का परिणाम थी।
उनके सफर में एक बड़ा मोड़ दो साल पहले आया, जब उन्होंने भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के नेशनल सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस (NCOE) ईटानगर में प्रवेश लिया। कचारी जनजाति से आने वाली मोनिखा ने कहा, “एनसीओई ईटानगर ने मुझे वह सब कुछ दिया, जिसका मेरे जैसे छोटे गांव की खिलाड़ी केवल सपना देख सकती थी—बेहतर ट्रेनिंग, पोषण, मार्गदर्शन और चोट से उबरने की सुविधा। इस सहयोग के बिना यहां तक पहुंचना बहुत मुश्किल था।”
इसके बाद उनकी प्रगति लगातार होती रही। 2023 में उन्होंने स्कूल नेशनल्स में स्वर्ण पदक जीता। 2024 में ओडिशा के संबलपुर में आयोजित खेलो इंडिया अस्मिता लीग में रजत पदक हासिल किया। 2025 में तेजपुर में राज्य चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता और चंडीगढ़ में इंटर-यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में आठवां स्थान प्राप्त किया।
हालांकि, इस उपलब्धि का रास्ता आसान नहीं था। पिछले तीन महीनों से मोनिखा अपने दाहिने घुटने की चोट से जूझ रही थीं, जो उन्हें ट्रेनिंग के दौरान लगी थी।
चोट को देखते हुए उनके कोचों ने उन्हें खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में हिस्सा न लेने की सलाह दी थी, लेकिन 19 वर्षीय मोनिखा ने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया और दर्द के बावजूद मैदान में उतरने का फैसला किया।
मोनिखा ने कहा, “मेरे कोच मेरे घुटने को लेकर चिंतित थे और उन्होंने कहा था कि आराम करना बेहतर होगा। लेकिन खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स जैसे मौके बार-बार नहीं आते। मैं इतने बड़े मंच पर खेलने का अवसर गंवाना नहीं चाहती थी।”
मोनिखा ने आगे कहा, “मैं लगातार बेहतर बनना चाहती हूं और एक दिन भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहती हूं। यह गोल्ड तो बस शुरुआत है।”