रायपुर प्रदेश में सरकार की किसान हितैषी नीतियों से और कृषि विभाग के उचित मार्गदर्शन से किसानों को नई दिशा मिल रही है। ऐसे ही जिला बेमेतरा के ग्राम अकलवारा के प्रगतिशील कृषक श्री संतोष साहू ने इस वर्ष खेती के क्षेत्र में एक सराहनीय, दूरदर्शी और अनुकरणीय निर्णय लेकर यह सिद्ध कर दिया है कि सही फसल चयन और वैज्ञानिक खेती पद्धतियों को अपनाकर कम संसाधनों में भी अधिक लाभ अर्जित किया जा सकता है। परंपरागत रूप से ग्रीष्मकाल में धान की खेती करने वाले श्री साहू ने इस बार ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर 5 एकड़ क्षेत्र में चने (दलहन) की फसल लेकर जल संरक्षण, लागत नियंत्रण और आय वृद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है।
ग्रीष्मकालीन धान की खेती में अत्यधिक मात्रा में पानी, बिजली, डीज़ल तथा श्रम की आवश्यकता होती है। लगातार गिरते भू-जल स्तर, बढ़ती उत्पादन लागत और सीमित संसाधनों को ध्यान में रखते हुए श्री संतोष साहू ने फसल परिवर्तन का निर्णय लिया। कृषि विभाग के अधिकारियों एवं कृषि वैज्ञानिकों की सलाह, साथ ही शासन द्वारा संचालित फसल विविधीकरण एवं दलहन प्रोत्साहन योजनाओं से प्रेरित होकर उन्होंने कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली चना फसल को अपनाया।
किसान श्री साहू बताते है कि चना फसल की खेती में आधुनिक एवं वैज्ञानिक कृषि तकनीकों का समुचित उपयोग किया, जिसमें प्रमुख रूप से लगभग 5 एकड़ क्षेत्र में समय पर बुवाई, उन्नत एवं प्रमाणित चना बीज का चयन, संतुलित मात्रा में रासायनिक उर्वरक एवं जैविक खाद का प्रयोग, आवश्यकता अनुसार सीमित सिंचाई, जिससे जल की बचत हुई, कीट एवं रोगों की रोकथाम हेतु नियमित निगरानी एवं समय पर उपचार। इन वैज्ञानिक उपायों के परिणामस्वरूप खेत में चने की फसल की बढ़वार अत्यंत संतोषजनक है और वर्तमान स्थिति को देखते हुए उच्च गुणवत्ता की अच्छी उपज मिलने की पूरी संभावना है।
चना फसल अपनाने से जहां एक ओर ग्रीष्मकालीन धान की तुलना में पानी की खपत में भारी कमी आई है, वहीं दूसरी ओर सिंचाई, बिजली और श्रम लागत भी काफी घट गई है। चना एक दलहनी फसल होने के कारण यह मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर भूमि की उर्वरता बढ़ाने में भी सहायक है। बाजार में चने की मांग और अच्छे भाव को देखते हुए श्री संतोष साहू को इस वर्ष अधिक शुद्ध लाभ प्राप्त होने की पूरी उम्मीद है।
श्री संतोष साहू का यह प्रयास क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का उदाहरण बन रहा है। यह पहल यह स्पष्ट संदेश देती है कि यदि किसान परंपरागत फसलों के स्थान पर परिस्थितियों के अनुरूप दलहन एवं कम पानी वाली फसलों को अपनाएं, तो वे न केवल जल संरक्षण में योगदान दे सकते हैं बल्कि अपनी आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ कर सकते हैं।